लगता है की बॉलीवुड पर कोई काला साया मंडरा रहा है जो हटने का नाम नहीं ले रहा | पिछले एक साल में कोरोना की वजह से बॉलीवुड में काफी उथल पुथल हुयी जो अभी तक सम्भली नहीं है। इस साल कोरोना के चलते कितने ही सितारों को वह ले डूबा। चाहे वो अक्षय कुमार हो, कटरीना कैफ हो, गोविंदा, सबको कोरोना ने अपना शिकार बनाया। अब अगर फिल्मों की बात करे तो डायरेक्टर्स की भी परेशानी ज़्यादा बड़ गई है।


दरअसल कुछ फिल्मों के “स्ट्रांग कंटेंट” को लेकर एक आदेश जारी किया गया। भारत सरकार ने फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) को कैंसिल कर दिया है। केन्द्र सरकार ने दो दिन पहले दी ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स (रैशनलाइजेशन एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) ऑर्डिनेंस, 2021 जारी किया था जिसमे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 में कुछ वर्गों को छोड़ कर “ट्रिब्यूनल” शब्द को “हाई कोर्ट” के साथ अन्य वर्गों में बदल दिया गया। इसका अर्थ ये है की अब अगर फिल्म डायरेक्टर को सेंसर बोर्ड के फैसले से कोई भी आपत्ति होगी तो उसे सीधे हाईकोर्ट में अपील करनी पड़ेगी। इस फैसले के बाद काफी फिल्म कलाकारों ने विरोध जताते हुए इसको इंडस्ट्री का “ब्लैक डे” घोषित कर दिया। कुछ कलाकारों ने अपने सोशल मीडिया पर ये याचिका जाहिर की।


स्कैम 1922 के डायरेक्टर हंसल मेहता ने लिखा “क्या हाई कोर्ट के पास इतना समय है की वह हर फिल्म सर्टिफिकेशन को पास करते रहेंगे? कितने फिल्म डायरेक्टर्स के पास अदालत जाने की पहुंच है? यह निर्णय क्यों लिया गया? निर्माता-निर्देशक और संगीतकार विशाल भारद्वाज ने भी ट्वीट के जरिए सरकार के फैसले पर गुस्सा जाहिर किया और कहा हिंदी सिनेमा के लिए ये बहुत दुखत दिन साबित हुआ है। आपको फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल (FCAT) के बारे में जानकारी देते है। भारत सरकार ने सिनेमेटोग्राफ एक्ट के तहत 1983 में फिल्म सर्टिफिकेशन ट्रिब्यूनल का गठन किया था। इस ट्रिब्यूनल में डायरेक्टर्स सेंसर बोर्ड के फैसले के खिलाफ अपील करते थे ।अगर सेंसर बोर्ड ने कोई कट या कोई सुधार का आदेश दिया हो और डायरेक्टर को लगे कि सेंसर बोर्ड का ये आदेश सही नहीं है, तो वे ट्रिब्यूनल में अपील कर सकते थे। पर अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि अब डायरेक्ट हाई कोर्ट ही फैसला करेगा।


इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (इम्पा) के प्रेसिडेंट टीपी अग्रवाल ने बताया कि फिल्म उद्योग के लिए ये ट्रिब्यूनल निरस्त हो जाना बहुत ही बुरी खबर है। अब तक हम लोग सेंसर बोर्ड के फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल में चले जाते थे, तो काफी सारे मामले सेटल भी हो जाते थे। ट्रिब्यूनल खुद सर्टिफिकेट जारी करता था, जो हमारे लिए मान्य होता था। शायद ही कोई मामला होगा, जहां ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में जाना पड़ा हो। अब ट्रिब्यूनल न रहने से सीधे हाईकोर्ट जाना होगा तो फैसला मिलने में काफी समय लग सकता है। फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर ने बताया कि सेंसर बोर्ड के बाद फिल्म मेकर के पास कोई विंडो तो होना चाहिए जहां वह अपनी बात कह सके, वह सेंसर बोर्ड के बाद सीधे अदालत कैसे जाएगा। फिल्म मेकर्स के लिए यह एक हैरेसमेंट है। मयंक के अनुसार ट्रिब्यूनल ने हमेशा अहम फैसले दिए हैं। “लिपस्टिक अंडर माय बुर्का” जैसी अनेक फिल्मों के फैसले कम समय में हुए हैं। यह ट्रिब्यूनल, सेंसर बोर्ड के ऑब्जेक्शन के बाद सेंसर बोर्ड की मांग के अनुसार उसमें बदलाव के सुझाव देकर सर्टिफिकेट देता था। उसके पास सर्टिफिकेट देने का अधिकार था लेकिन अब वह पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है।

अदालतों के पास अब यही काम रह गया है की अपने 20-20 साल के केस को छोड़कर फिल्मो को देखे।
जहां एक तरफ हाई कोर्ट उन मामलो में कितने साल गुज़ार देता है जिसमे फैसला जल्दी हो सकता है, ऐसे में अगर वह फिल्म देखने बैठ गए तो गंभीर मामलो को कौन देखेगा? और फिल्म डायरेक्टर्स के लिए भी बहुत बड़ी दुविधा का विषय है क्योंकि अगर हाई कोर्ट फैसला करेगी तो उसके लिए अलग से वकील करना पड़ेगा, उनके आदेश का वेट करना पड़ेगा, हो सकता है किसी सीन को दुबारा शूट करना पड़े। तो ऐसी कई सारी मुश्किलें खड़ी हो सकती है।

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